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कवि की अन्तर्वासना

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पहली चूत का सेक्स विवरण:

यह कहानी है दुबली पतली पर बड़े दूध वाली की
देखने में सीधी सी थी पर दिल से मतवाली की

मध्यमवर्गीय घर में जन्मा, छोटा सा एक कवि हूँ।
चूत भी मैंने बहुतेरी मारी, चूतों का अनुभवी हूँ।

मैं हूं लगभग 30 वर्ष का, मध्य भारत में रहता
कर्म मेरा बहुचर्चित सा है, धूप छांव सब सहता

आंखें नशीली रंग गेहुआ, साधारण सा हूँ दिखता
अन्तर्वासना के पृष्ठ पर, प्रथम कहानी लिखता

मत पूछो हम अब तक क्या खोए क्या पाए थे।
कुछ लड़कियों के चुम्बन तो कुछ के दूध दबाये थे।

जैसे कानून हमेशा रहता है सबूत की तलाश में
वैसे ही मैं फिरता था उस समय चूत की तलाश में

मैं चूतिया से कैसे बना चुदक्कड़ बताऊं कहानी
औरत हो या मर्द गिरे सबीके में से झराझर पानी

यह कहानी है दुबली पतली पर बड़े दूध वाली की
देखने में सीधी सी थी पर दिल से मतवाली की

देखकर मुझको बदले चाल, चूतड़ खूब मटकाती
यह मांग या मैं खुद दे दूं सोच सोच संकुचाती

मुझसे पहले भी था उसका लफड़ा किसी और से
मेरे लिए पहला अनुभव था वो गुजरी थी इस दौर से

स्वाभिमान के चलते चाहे कि तुम्ही शुरुआत करो
मैं तो हामी भर ही दूंगी पहले आकर बात करो

मैंने भी फिर मौका पाकर बात एक दिन छेड़ी
पहली रूठी फिर मुस्काई करके नजरें टेढ़ी

उसकी इस हरकत पर मैं फूला नहीं समाया
पकड़ कर पीछे से गर्दन चूमी, हाथों से दूध दबाया

पतली कमर में हाथ डाल कर जैसे उसे घुमाया
एक झटके में एक दूजे को, बांहों में हमने पाया

मौन स्वीकृति मिली जो उसकी, मेरी हिम्मत बढ़ गई
नजरें उसकी आंखों से हटके, लाल होठों पर पड़ गई

एक हाथ चूतड़ पर, एक पूरी पीठ पर घूमे
कभी गाल तो कभी होठों को मैंने कसकर चूमे

आलिंगन से शरीर में, एक झुरझुरी लगी होने
मैं उसकी मदहोशी में वह मुझ में लगी खोने

कुछ ही देर में ही दोनों अगले चरण पर लगे बढ़ने
दोनों हाथ पीछे से हटकर अब सीने पर लगे चलने

धीरे-धीरे करके उसकी कुर्ती स्तन तक खिसकाई
फिर बारी बारी उन दोनों की कर दी खूब चुसाई

आनाकानी की थोड़ी पर जमीन पर उसे लिटाया
मैंने भी फिर देर न की, झट से उसके ऊपर आया

पता नहीं था मुझको कि वो ये कमाल कर देगी
पहली बार में ही वो चुदने को सच में हां कर देगी

बोली जो करना है जल्दी कर लो, मुझको घर जाना है
या फिर मुझको जाने भी दो, कल भी तो आना है

क्योंकि मेरा प्रथम प्रयास था, लगा मैं थोड़ा डरने
सोचा ना था इतनी जल्दी, यह काम मिलेगा करने

चूड़ीदार सलवार थी उसकी, एक ही पैर निकाला
जल्दी से पैंटी खिसकाकर मैंने लंड सम्भाला

लंड को मेरे बिल्कुल ना छूती, कुर्ती से मुंह ढकती
नौसिखिया कैसे करता है, चोर नजर से तकती

पहली बार के उतावलेपन में अधखड़ा लंड घुसाया
उसकी बुर खेली खाई थी, झट से उस में समाया

लंड ने झट से पानी उगला, आठ दस झटके मारे
मैं खुद पर शर्मिंदा था, मेरा मन खुद को धिक्कारे

मैं खिलाड़ी हारी टीम का, बिल्कुल ऐसा दिखता
कवि होकर भी मनोस्थिति, शब्दों में कैसे लिखता

वह कपड़े संभालते हुए नीचे से फिर सामने आई
मेरी व्यथा समझ गई और मंद मंद मुस्काई

मैं लगा सोचने अब इसको कैसे बेहतर चोदूंगा
ऐसे मैं तो आत्मविश्वास मैं अपना खो दूंगा

दूसरी बार मिलने की योजना मैंने खूब बनाई
वह चलकर पास में मेरे आती नजर फिर आई

पहले उसको चूमा चाटा, फिर गालों को काटा
उसकी कुछ बनावटी शर्म पर मैंने उसको डांटा

अब तो कुछ शर्म छोड़कर मेरा साथ थी देती
धीरे-धीरे चुम्बन करती, लंड हाथ में लेती

उसकी इस प्रतिक्रिया से मुझ में जोश बढ़ा अब
पहले से कुछ ज्यादा बेहतर मेरा लंड खडा अब

जल्दी से फिर पेंटी निकाली, चूत को तनिक निहारा
उसकी मखमली चूत को छूकर, चढ़ गया मेरा पारा

30-40 बस लंड थे मारे, बांध सब्र का टूटा
पता नहीं क्यों इस बार भी कैसे जल्दी छूटा

कुछ रूठी और कुछ चिड़चिड़ी सी वो लगी थी जाने
शायद वो कुछ और चाहती थी मुझको समझाने

तीसरी बार फिर अगले दिन, मन लगा घबराने
चूत मारने में होता मुझको क्या मेरा मन ना जाने

इस बार गोली खाकर, चुदाई करने का सोचा
पर उस दिन वो आ न सकी और हो गया पूरा लौचा

अबकी बार मिली जो मुझको पूरी व्यथा सुनाई
उसने मेरी पीड़ा समझी फिर बात मुझे समझाई

चूत को बस सहज समझना, उतावले कभी ना होना
धीरे-धीरे सब सही करूंगी, धैर्य तनिक ना खोना

जैसे जैसे मैं बोलूंगी, बस वैसा वैसा करना
डर को अपने पीछे छोड़ो, आगे कभी ना डरना

खुद को आज गुरु समझती, जाने कैसी ऐंठी
मुझको लिटा धरती पर आकर लंड पर बैठी

मेरा जोश बढ़ा ही जैसे, उसने मुझको डांटा
मैं थोड़ा शिथिल हुआ तो उसने होंठ को काटा

कभी बेरुखी तो कभी उत्तेजना, मैं उस पर झन्नाया
वो मुस्कुराकर बोली मुझसे कितनी बार लंड घुमाया

मैं चाहूं ध्यान तुम्हारा, बार-बार भटकाना
चरमसुख की शीघ्र दौड़ में, बार बार लटकाना

मनोबल मेरा बढ़ चुका था, उसके इस प्रयोग से
पर मैं अब तड़प उठा था, चरमसुख के वियोग से

फिर उसको नीचे गिरा के, जमकर लंड घुसाया
इस बार की चुदाई में उसका, अंग-अंग मुस्काया

मेरी गति बड़ी जब-जब, तब तब खुद को रोका
ऐसा करके उसको मैंने बीस मिनट तक ठोका

फिर बाद में कई बार चोदा और लबों से लब मिले
उसकी ढीली चूत से मुझको, कड़क अनुभव मिले

हमारे इस मधुर मिलन पर फिर काली बदली छाई
एक खबर मिली कुछ ऐसी, निश्चित हुई बिदाई

उसको अब कामक्रीड़ा क्षेत्र से दूर कहीं जाना था
परिस्थिति कुछ ऐसी समझो, लौट के ना आना था

उसने हिम्मत करके मुझको पूरी बात सुनाई
गला रूंधा सा हुआ उसका, फिर आंखें भी भर आई

कुछ देर दोनों मौन खड़े, फिर वो मुझसे लिपटी
हमारी खुशियां वर्षों की अब, चंद दिनों में सिमटी

बोली मैं नहीं चाहती तुम बस चोदन में लिप्त रहो
अंतिम बार चुदूंगी ऐसे कि तुम जीवन भर तृप्त रहो

पहली बार वह मिलने आई, इतनी सज संवरकर
उसको सम्मुख खड़ा किया और देखा नजरें भरकर

उसके दोनों गोरे गालों को, बारी बारी चूमा
वो आई थी ब्रा पहनकर मेरा मन अब झूमा

मैं कुछ कुछ छूता उसको, वो मुझको अधिक टटोले
विरह वेदना को वो समझे, लगातार कुछ बोले

मुझको हटा तनक दूर कुर्ती को स्वयं उतारे
मानो कोई कली प्यारी सी भंवरे पर डाले डोरे

ब्रा में उसके गुलाबी स्तन मेरे मन को भाते
शीघ्र ही मुझको आगोश में ले लो वे मानो चिल्लाते

बारी बारी दूधों से खेला, फिर दोनों को चूसा
दोनों तन गए मानो ऐसे, भरा ठूँस ठूँस कर भूसा

खुद जाकर जमीं पर लेटी, मुझको पास बुलाती
उसकी हर एक अदा आज, मेरे मन को भाती

आलिंगन सी बीच द्वंद में, दोनों एक दूजे को चूमे
कभी मैं ऊपर कभी वो नीचे, हम अपनी धुन में झूमे

इस मस्ती के दौरान ही उसने, खुद का नाड़ा खोला
ऐसा तुम कम ही करती हो, मैं धीरे से बोला

बोली तुम थे जो चाहते, वह सब आज करूंगी
इन स्मृतियों को सहेजकर अपने पास रखूंगी

ब्रा पेंटी दोनों मैच की, उस पर क्या थी लगती
मॉडल जैसी उसकी बनावट, आंखें मेरी तकती

उसका यह रूप देख कर मुझसे अब सहा गया ना
उसने मेरा किया समर्थन उससे भी रहा गया ना

मन करता था ऐसे चोदू, टट्टे तक अंदर कर दूं
उसकी इस बहती योनि को, अपने वीर्य से भर दूं

उत्तम चुदाई के बाद मेरे लंड ने लावा उगला
गहरी खाई सी चूत ने बूंद बूंद को निगला

फिर उसने केवल पेंटी पहनी, गोद में लेटी आकर
मैंने सोचा खुशनसीब था इसको जीवन में पाकर

लंड उसके होठों के पास था और वह नौचती झांटे
मैंने सोचा कह कर देखूं शायद आज लंड को चाटे

मैंने अपना ढीला लंड ही उसके होठों पर लगाया
कुछ मुस्कुराई पर बनावटी, गंदा सा मुँह बनाया

बोली अच्छा ठीक है चूमूँगी, पहले इसको धो लो
आज सब कुछ करना चाहती, अपना मुँह तो खोलो

कभी चमड़ी पर कभी नोक पर, कभी टट्टों को चूमे
अपनी स्थिति बदल बदल कर, वह आजू बाजू घूमे

पहले आई 69 स्थिति में, फिर अपनी स्थिति बदली
वह शायद चुसवाना चाहे पर कह ना पाई पगली

उसको मैंने नीचे लिटाया, खुद पोजीशन में आया
बुर को ज्यों ही जीभ से चाटा, लौड़ा मुंह में पाया

मेरे लिए पहला अनुभव था मन से बुर को चाटा
उसने भी पूरी लंड को चूसा, कई बार तो काटा

मैं बोला क्यों ऐसी तुमने, पहले करवाई नहीं चुदाई
आज भला क्यों तुमने, मुझको ऐसी कला दिखाई

वो बोली तुम लड़के थे, तुम पहले चूत को चाटते
मैं फिर मुंह में ना लेती, तुम भले मुझे डांटते

आज अपना अंतिम मिलन है,सब कुछ चाहु करना
तुम्ही बताओ ये सव करने की, कहाँ पड़ी थी वरना

मैंने माना देर हुई पर, आज पूरी कसर करूंगा
तुम्हारी इस रसीली बुर को, मुँह में खूबी भरूंगा

दोनों इस स्थिति में एक दूजे को अंदर उतारते रहे
वह लंड मुंह में और हम बुर में मुँह मारते रहे

दो बार झड़ी मुंह में मेरे, पर उत्तेजना में ना कमी रही
जब तक मैंने ना छोड़ा, तब तक वो भी जमी रही

फिर मैंने भी लंड तान कर मारा अंतिम झटका
उसने कुछ तो जमीं पर थूका, कुछ को अंदर गटका

लगभग 2 घंटे की चुदाई में, दोनों थोड़े थक गए
एक दूजे की बांहों में अधनंगे ही ढलक गए

इतनी जल्दी तीसरे दौर को कैसे करूं मैं पूरा
इस दौर के बिना मिलन ये रह ना जाए अधूरा

मैं बोला बस खड़ा करो फिर तुम देखो आगे
चूत से मिली हरारत, बस केवल चूत से भागे

इतनी जल्दी खड़ा हो कैसे उसने मन को तौला,
उसने खुद में दमभर कर बालों को अपने खोला

आज अपनी शर्म भुलाकर खुद ही सब कुछ करती
मैं आंखें बंद कर लेटा और वो लौड़ा मुंह में भरती

उसका अब ये रूप देख, लंड हरकत में आया
मेरे लंड को बढ़ते देखा, उसका मन हर्षाया

लंड जैसे खड़ा हुआ तो झट से उस पर बैठी
इतनी जल्दी उत्साह जगाके वह खुद अपने पर ऐंठी

जितनी थी शक्ति उसमें, उसने चूतड़ लंड पर मारे
फिर निढाल होकर लुढ़की और अपने पैर पसारे

बेसुध सी पड़ी थी नीचे और चोदन को मुझे बुलाए
वो जाने ऐसा क्षण जीवन में आगे कभी ना आए

मेरी लगातार चुदाई में तीव्र गति अब आई
उसने मेरी हालत समझी और पूरे जोश में आई

अपने घुटनों को कंधों पर दबाए चूतड़ को उचकाती
कुछ भी करके मेरे लंड को मेरे नाभि तक पहुंचाती

उसकी इस लंबी चुदाई से मैं तो परिपक्व होने लगा
उसकी बुर का बना भोंसड़ा, फक्क फक्क होने लगा

मैंने भी पूर्ण शक्ति से अंतिम समय तक की चुदाई
उसकी बुर में लावा फूटा, फिर सांस चैन की पाई

इस लंबी चुदाई से दोनों थक कर चूर हुए
क्या बतलाऊं किस पीड़ा में, दोनों कैसे दूर हुए

वो अगले दिन जब अंतिम किस करने को आई
मैंने केवल माथा चूमा और अपने गले लगाई

वह चाहती थी फफक के रोना, पर वो रोती कैसे
इस समाज के डर से अपना आपा खोती कैसे

चूतिया से ऐसे बना चुदक्कड़, उसका ही आभार है
मेरी वीर्य की हर बूँद पर उसका ही अधिकार है

ना थी कोई साइकोलोजिस्ट ना उतनी पढ़ी लिखी थी
पर उसमें उत्कृष्ट गुरु की मुझ को छवि दिखी थी

धन्य है अन्तर्वासना जहां कविता को स्थान मिला
लिखूंगा नई कहानी गर कविता को सम्मान मिला

खर्च हो ना जो जीवन भर संपत्ति इतनी अकूत मिले
हर दुख हो छूमंतर, बाबाजी की ऐसी भभूत मिले

अन्तर्वासना के पाठकों के लिए है बस यही कामना
उनकी क्षमता से ज्यादा उनको, नए वर्ष में चूत मिले!

प्रिय पाठको, आपको यह पहली चूत का सेक्स विवरण कैसा लगा?
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