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टीचर भाभी को सेक्स के अनूठे पाठ- 2

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नंगी भाभी सेक्स कहानी में पढ़ें कि मैं अपनी सहेली के युवा देवर की नशीली आँखों के वशीभूत उसकी हो गयी, खुद को उसके हवाले कर दिया. वो मेरे जिस्म से कैसे खेला?

यह कहानी सुनें.

हैलो फ्रेंड्स, मैं दीप्ति एक बार पुन: अपनी और सारांश के बीच हुई चुदाई की कहानी का अगला भाग लेकर हाजिर हूँ.
कहानी के पहले भाग
सहेली के देवर ने मुझे लुभा लिया
में अब तक आपने पढ़ा था कि मैं सारांश के साथ उसके कमरे में अकेली हो गई थी.

अब आगे नंगी भाभी सेक्स कहानी:

मैंने आंखें बंद करके अपने पति का चेहरा याद किया. मैं उन्हें कभी भी धोखा नहीं दे सकती थी.
एक गहरी सांस लेकर मैंने टॉयलेट का फ्लश दबाया और बाहर आ गयी.

सारांश बिस्तर पर आधा लेट कर छत को घूर रहा था पर उसकी नज़र मुझ पर टिक गयीं.
इससे पहले कि मैं कुछ कहती, उसने मेरी आंखों की ओर इशारा किया.

मैंने दीवार पर लगे बड़े से आईने में देखा तो पाया, मेरा काजल थोड़ा फैल गया था और उसे ठीक करने के लिए मैं आईने के सामने चली गयी.

‘सॉरी भाभी.’ सारांश ने बिस्तर पर बैठे रहते हुए कहा.
मैंने पूछा- किस बात के लिए?

“मुझे पता है आपको मेरे देखने से परेशानी हो रही है, लेकिन आप हैं ही इतनी खूबसूरत!”
मैंने आईने में उसे देखते हुए कहा- इतनी भी खूबसूरत नहीं हूँ मैं … और तुम तो अभी कॉलेज में हो, वो भी मुंबई में, अमीर हो और इतने हैंडसम, मैं क्यों खूबसूरत लगने लगी भला!

मैंने काजल ठीक किया ही था कि सारांश बिस्तर छोड़कर मेरी तरफ आने लगा … और मैं उसे रोक भी नहीं सकी.

एक तड़ित सा था वो पल, मेरे बस से बाहर!

सारांश अपना चेहरा मेरी गर्दन के पास लाया और मुझ पर किसी भौंरे की तरह मंडरा कर उसने कहा- आप इस दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हैं भाभी!
मेरी गर्दन पर उसकी गर्म सांसें मादक नृत्य कर रही थीं. मेरी आंखें आने वाले पलों के बोझ तले बंद हो गयीं.

‘सॉरी भाभी.’ सारांश मेरे दाएं कान के पास बुदबुदाया.
मैंने जैसे-तैसे बड़ी मुश्किल से पूछा- किस बात के लिए?
‘आपको हुए दर्द के लिए.’ सारांश ने कहा.

जब उसका चेहरा हल्का सा मेरी गर्दन को छू रहा था.
मुझे उसकी बात समझ में नहीं आई और मैंने सवालिया अंदाज में पूछा- हम्म?

मेरे सवाल करते ही सारांश ने पहले धीरे से मेरे कान का कोना अपने होंठों के बीच लिया और उसे हल्का सा चूम कर दांतों के बीच दबा दिया.
और मेरे मुँह से एक आह निकल गयी.

वो बुदबुदाया- इस दर्द के लिए सॉरी.

मेरे सारे बदन में चींटिया रेंगने लगी थीं.
सारांश ने मुझे किसी फूल की तरह बड़ी आसानी से पलटाया और आईने के सहारे टिका दिया.

मेरी आंखें बंद थीं लेकिन उसकी सांसों को मैं अपने चेहरे पर महसूस कर रही थी.
मुझे पता था वो क्या करने वाला था और मेरे अन्दर की सारी दुविधा पता नहीं कहां खो गयी थी.

पहले उसने मेरे होंठों पर धीरे से अपने होंठ फिराए, फिर जीभ और फिर मेरे निचले होंठ अपने होंठों में समा लिए.

कुछ सेकेंड उन्हें प्यार से चूमने के बाद उसने मेरे होंठों पर अपनी जीभ लगानी शुरू कर दी.
एक अनोखे और अनजाने रोमांच के कारण मैं अपने अन्दर का युद्ध हार गयी और अपने होंठ खोलकर अपनी जीभ भी लड़ा दी.

जो थोड़ा बहुत ख्याल था पति का, वो भी सारांश के मुझे अपनी बांहों में लेते ही चला गया.

उसमें कुछ अलग था, वो एक शेर की तरफ मुझ पर झपट भी रहा था लेकिन किसी कवि की तरह उसके प्यार करने की शैली में एक अदब भी था.
हमारा चुम्बन इतना जोरदार था कि मैं सांसें लेना भी भूल गयी थी.

शायद उसे ये पता चल गया और उसने मेरे निचले होंठों को खींचते हुए मुझे खुद से अलग कर लिया.
मैं एक गहरी सांस लेकर अपनी जगह पर आंख मूंदें खड़ी रही.

अचानक मुझे दरवाजे की सिटकनी के लगने की आवाज़ आई.
देखा तो पाया सारांश दरवाजा बंद करके मेरी ओर बढ़ रहा था.

मैंने पूछना चाहा- अगर कोई आ …
इससे पहले कि मैं आगे बोल पाती, सारांश ने मुझे अपनी बांहों में भर लिया और कमर से पकड़कर पीछे झुकाते हुए मेरे होंठों को फिर से अपने होंठों में भींच लिया.

मेरे बाल फर्श को छूने की कोशिश करने लगे.

‘सब अपने-अपने खेलों में बिज़ी हैं दीप्ति भाभी.’
सारांश ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा और मेरे गले को बदहवासी से चूमने लगा.

मेरे गालों को चूमते हुए अपने होंठ मेरे बाएं कान के पास लाकर बोला- बस शोभा भाभी को ख्याल आ सकता है आपका… और मुझे भी गायब देखकर वो समझ जाएंगी कि उन्हें मेरे कमरे में नहीं आना है … और ना ही किसी को आने देना है.

सारांश के हाथ मेरे कंधे पर पहुंच गए, ठीक मेरे आंचल की पिन पर … और अगले ही पल मेरा आंचल फर्श चूमने लगा.
उसने मुझे खुद से अलग किया और लालच से ब्लाउज में क़ैद मेरे उन्नत उभारों को देखने लगा.

मैंने शर्म से अपनी आंखें नीचे कर लीं.
जो सरप्राइज़ मैंने अपने पति के लिए रखे थे, वो अब सारांश को मिलने वाले थे.

जब मैंने ओट से झांका, तो पाया कि सारांश की आंखें मेरे उभारों की घाटी से हट ही नहीं रही थीं.
जैसे आधी कहानी पढ़कर कोई बाकी का मसाला जानने को बेताब होता है.
इसी बेताबी में उसने मेरी हथेली पकड़ी और मुझे बिस्तर के पास ले गया.

सारांश बिस्तर पर बैठ गया और मुझे अपने सामने खड़ी कर दिया, जिससे मेरी गहरी कामुक नाभि ठीक उसके चेहरे के सामने आ गयी.
उसने मुझे आंखों से नाभि तक गौर से देखा और पूछा- कैसे छिपा लेती हैं आप इतनी क़यामत, दीप्ति भाभी?

मैंने शर्म और वासना से लाल हुआ अपना चेहरा नीचे कर लिया.
उसने मेरे पेट पर अपनी नाक धीरे से रगड़ी और फिर अपनी जीभ पूरी बाहर निकालकर मेरी नाभि की तरफ बढ़ाई लेकिन छुई नहीं.

मेरी नाभि उम्मीद में कांप रही थी.

उसने अपनी जीभ को मेरे पेट पर नाभि के चारों ओर धीरे से रगड़ा लेकिन नाभि फिर भी अनछुई रह गयी.

मेरी आंखें इंतज़ार के दर्द में बंद होने लगीं. मेरी छाती लहरों की तरह उफान पर थी.

अचानक उसने मेरी साड़ी के ऊपर से ही मेरे कूल्हों को इतनी ज़ोर से दबाया कि मैं आगे की तरफ गिरने लगी.
मुझे सहारा लेने के उसके सर को पकड़ना पड़ा और उसी पल में उसकी जीभ मेरी नाभि की गहराई में समा गयी.

आह …

अगले ही पल थोड़ी बाहर निकली और फिर और गहराई में धकेल दी गयी.

मुझे जैसे पंख लग गए थे.
मैंने इतनी गहरी सांस ली, जैसे मैं घंटों से पानी के अन्दर थी.

सारांश ने जीभ को और तेज़ी से अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया.

मैंने अपनी आवाज़ दबाने के लिए दांतों को भींच लिया और उसके बालों में उंगलियां फंसा कर उसके सिर को जकड़ लिया.

कुछ पलों बाद सारांश ने अपनी जीभ निकाल कर मेरी सोई सी आंखों में झांककर अपनी मर्दानी आवाज़ में पूछा- अगर आप ऐसे शरमाओगी, तो हम सेक्स का ये पाठ कैसे पढ़ेंगे?

अभी मैं अपनी सांसें एकत्रित कर ही रही थी कि सारांश के हाथ मेरे ब्लाउज की तरफ बढ़े.
ये पहली बार था जब मेरे पति के अलावा मैं किसी और के सामने निर्वस्त्र हो रही थी.

उत्साह के कारण मैं ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी. उसने अपने पैरों को खोलकर मुझे उसके बीच खड़ा किया और मुझे थोड़ा नीचे झुकाकर ब्लाउज की डोरी खोल दी.
जैसे-जैसे सारांश ने ब्लाउज के हुक खोले, मेरे 36 इंची उजले उभार, कसी हुई सेक्सी ब्रा में बादाम के आक़ार के निप्पल को मुश्किल से छिपाते हुए उजागर होते गए.

उन्हें देख कर उसकी आंखों में चमक बढ़ती गयी.

ब्लाउज का आख़िरी हुक खोलते ही उसने मेरे बाएं स्तन पर ब्रा के ऊपर से ही अपने मुँह से झपट्टा मारा.
एक हाथ से दूसरा स्तन मसलने लगा और दूसरे हाथ से वो मुझे ब्लाउज से आज़ाद करता रहा.

उसकी ये भूख देखकर मेरी शर्म और जाती रही और मेरी सांसें, आहों में … और आहें दबी हुई चीखों में बदलती चली गयीं.
अभी तो उसने मेरी योनि को छुआ भी नहीं था लेकिन जैसे वहां मानसून ने घुसपैठ कर ली थी.

जैसे ही मेरा ब्लाउज पर गिरा, बिना समय व्यर्थ किए सारांश ने मेरी ब्रा भी निकाल कर फेंक दी.
मेरे स्तन अपने चरम सीमा में फूले हुए दो सफेद गुब्बारों की तरह ठीक उसके चेहरे के सामने तेज सांसों पर सवार होकर आगे-पीछे हो रहे थे और उनके केंद्र में बादाम के आकार के मेरे दो निप्पल गुलाबी की तरह सिर उठाए खड़े थे.

कुछ पलों के लिए वो मेरे स्तनों को देखता रहा और फिर अचानक मेरी आंखों में!

मैंने झट से अपनी आंखें मूंद लीं.
लेकिन अगले ही पल वो अपने आप खुल गयीं क्योंकि सारांश ने मेरे दोनों निप्पल अपने अंगूठों और तर्जनी उंगली से पकड़ लिए थे.
उसने धीरे से मेरे दोनों निप्पल को रगड़ा और धीरे से खींचा.

उसकी आंखों में आगे आने वाला तूफान खोजने में मेरी धड़कनें भी थोड़ी थम गयीं.
सारांश ने मेरे दोनों निप्पल पर अपनी पकड़ मजबूत की और उन्हें आगे की तरफ खींचा.

जैसे-जैसे मेरे स्तन आगे की तरफ खिंचते गए और उन पर तनाव बढ़ता गया, मैं आंखें खुली रखने के लिए संघर्ष करने लगी.

मैं अपने इस जवान प्रेमी को जानवर में बदलते हुए देखना चाहती थी.
लेकिन तभी, मेरे स्तनों पर खिंचाव अपनी हद तक पहुंच गया और सारांश तेज़ी से उन्हें ऊपर-नीचे हिलाने लगा.

जैसे पानी से निकल कर मछली तड़पती है, उतनी ही तेज़ी से मेरे भारी उभार फड़क रहे थे.
मेरी तो जैसे आत्मा ने थोड़ी देर के लिए शरीर छोड़ दिया.

पूरा कमरा मेरी मादक सीत्कार से गूँज उठा.
अगर कोई देखता तो उसे यही लगता कि मेरे शरीर से कोई भूत उतार रहा है.

सारांश ने जैसे अचानक ये सब शुरू किया था, वैसे ही अचानक ही उसने अपने हाथ रोके और मेरे दोनों निप्पल को अपनी हथेली से मसल दिया.
मैंने एक लंबी सी आह लेकर उसे देखा.
वो एक धीमी सी मुस्कान के साथ एकटक मेरी ओर देख रहा था.

मैंने एक गहरी सांस ली ही थी कि उसने मेरे दाएं निप्पल को अपनी मध्यमा उंगली से ऐसे झटका मारा, जैसे कैरम में स्ट्राइकर को मारते हैं.
और इससे पहले कि मेरी आह ख़त्म होती, उसने मेरे दाएं स्तन को एक तमाचा जड़ दिया, जोर से, बहुत जोर से.

मेरे मुँह से एक चीख निकलने ही वाली थी कि उसकी बायीं हथेली मेरे होंठों पर आ रुकी.
इससे पहले कि मैं यह सब समझ पाती, उसने एक साथ ही मुझे खुद की तरफ खींचते हुए अपना अंगूठा मेरे मुँह के अन्दर डाल दिया.

इसी के साथ उसने अपने होंठ मेरे दाएं स्तन पर रख दिए और अपने दाएं हाथ से मेरे बाएं निप्पल को धीरे-धीरे झटके मारने लगा.
ये सब बिजली की गति से हुआ था.

उस पल में मैं खुद को किसी बेचारे राजा सा महसूस कर रही थी, जिसे कोई वीर योद्धा हर तरफ से घेर लेता है.
अंतर बस इतना था कि यहां जीत में आधा हिस्सा मेरा भी था.

मेरे होंठ जरा से और खुल गए … थोड़े दर्द में, थोड़े अचंभे में, थोड़े मजे में … और बाकी आगे आने वाले रोमांच के इंतज़ार में!

जैसे-जैसे उसकी जीभ मेरे दाएं निप्पल को शांत करती गयी, वैसे-वैसे उसकी उंगली मेरे बाएं निप्पल को अवाक करती गई.

सारांश की उंगली से मेरे निप्पल पर हुए हर वार के साथ मेरे मुँह में उसका अंगूठा थोड़ा अन्दर चला जाता, फिर थोड़ा बाहर ऐसे आ जाता, जैसे मेरा मुँह योनि हो और उसका अंगूठा लिंग.

मेरा मन तो बहुत था कि मेरे अन्दर उठने वाली हिलोरों को आवाज़ के सहारे बाहर आने दूँ … लेकिन खुल कर शोर कर नहीं सकती थी.
शायद खुद से निकल भी जाती लेकिन मेरे बदन की ही तरह मेरी आवाज़ पर भी पूरी तरह से सारांश का नियंत्रण था.

अचानक ही उसने अपना मुँह और उंगली को मेरे स्तनों से हटाया और अंगूठा मेरे मुँह से!
मैंने यह सोचकर आंखें खोलीं कि तूफ़ान थोड़ा शांत हुआ.
लेकिन फिर मैंने पाया कि उसने अपने दाएं हथेली को एक तमाचे के लिए मेरे बाएं स्तन से थोड़ा हटाकर तैयार रखा है.

मुझे पता था वो क्या करने वाला है और इस बार मैं उसका इंतज़ार कर रही थी.
लेकिन सारांश इस इंतज़ार में भी मुझे तरसा रहा था, जैसे कि चाहता हो कि मैं उस तमाचे के लिए उससे भीख मांगूं.

भले ही मेरे मुँह से चूं भी ना निकली हो, मगर मेरी आंखें जोर जोर से प्रार्थना कर रही थीं.
लेकिन सारांश मुझे अभी और सताना चाहता था.
उसने पहले अपनी हथेली को थोड़ी गति दी.

मेरे मुँह से एक टीस निकल गयी, मेरी आंखें बंद हो गयीं.
लेकिन कुछ हुआ नहीं.

जब मैंने आंखें खोलीं तो फिर से उसे पहले वाली कुटिल मुस्कान के साथ पाया.

आंखों में शरारत, माथे पर कोई बल नहीं.
मैं एक गहरी सांस ले ही रही थी कि उसने मेरे बाएं स्तन पर तमाचा जड़ दिया.

और इससे पहले कि मैं उस रोमांच को समेटने के लिए चीखती, मेरे दोनों उभारों को पकड़ कर खींचते हुए उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

जब उसकी हथेलियां मेरे उभारों की आग को सहला सहला कर शांत कर रही थीं, उसकी जीभ मेरे मुँह के अन्दर युद्धरत हो गयी थी.
लेकिन ये अब एक तरफ़ा नहीं था. मैं भी अब सब कुछ भूल चुकी थी.

मेरा घर, पति, मर्यादाएं, शर्म सब कुछ भूल कर मैं भी उसके साथ चूमाचाटी में लग गई थी.

दोस्तो और सहेलियो, आप नंगी भाभी सेक्स कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया और संदेश मुझे [email protected] पर भेजना ना भूलें.
आपके प्रोत्साहन से आगे की सेक्स कहानी लिखने में मज़ा आता है.

नंगी भाभी सेक्स कहानी का अगला भाग: टीचर भाभी को सेक्स के अनूठे पाठ- 3

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